3 वर्षीय शिशु में नीव की ईंट (मील के पत्थर) 3 year old child developments and milestones

3 वर्षीय शिशु में नीव की ईंट (मील के पत्थर) 3-Year-Old Development and Milestones

हमारा देश देवभूमि हैं, जो परंपराओं, मान्यता और विधानों से वर्षों से बंधा रहा है। हमारी मान्यता रही है कि 'एक बच्चे का प्रशिक्षण उसकी मां के गर्भ से ही आरंभ हो जाता है।' तभी तो अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में घुसना माता सुभद्रा के गर्भ में ही अपने पिता द्वारा सीख लिया था। परंतु दुर्भाग्यवश बाहर निकलने के विवरण के समय अभिमन्यु की माता सो गई, तो गर्भ में से बालक अभिमन्यु भी सो गए। इस कारण उनका प्रशिक्षण अधूरा रह गया।
क्या आप जानते हैं  कि इस प्रशिक्षण को पूरा किया जा सकता था। यदि अभिमन्यु के माता-पिता को यह पता होता कि प्रशिक्षण गर्भ से ही आरंभ हो जाता है तो अज्ञानतावश इक युवा बालक, सिर पर कृष्ण का हाथ होते हुए भी प्राथमिक शिक्षा में कमी के कारण युद्ध में वीरगति को प्राप्त न हुआ होता।

 महाभारत काल की इस घटना को यदि हमें कहानी मान लें और आज के समय में देखें तो-

1) मास्टर तृप्ति राज पांडे- उम्र 5 वर्ष- तबला बजाने में माहिर
2) मास्टर किशन श्रीकांत- उम्र 7 वर्ष- फिल्म डायरेक्टर
3) मास्टर आक्रत जायसवाल- उम्र 7 वर्ष- चिकित्सकीय शल्य कार्य (doing surgeries)
4) बेबी प्रियांशी सोमानी -उम्र 7 वर्ष - केलकुलेटर
5) मास्टर अरविंद चिदंबरम -उम्र 14 वर्ष- शतरंज
6) मास्टर तथागत -उम्र 17 वर्ष -पीएचडी की पढ़ाई पूर्ण की
7) मास्टर प्रवीण कुमार गोराकवी -उम्र पर्दा 15 वर्ष- नकली पैर बनाने की कला सीखी 
आदि अनेकों ऐसे नाम मिल जाएंगे जिनकी उनकी रूचि से संबंधित शिक्षा उम्र के प्रथम वर्ष से ही शुरू हो गई थी। तभी वे 7 से 17 वर्ष तक की छोटी सी आयु में ही कमाल दिखाने में सफल रहे।

 छोटी उम्र में प्रशिक्षण नीव की ईट क्यों है?


(A) मानसिक विकास (Mental development)-


 1- इस उम्र में सीखने की शक्ति प्रबल होती है। 
 2- प्रत्येक चीज को जानने की इच्छा होती है।
 3- बच्चे में खुद का काम करने की जिद भी रहती है।
 4- खुद सब काम करने पर उसका ध्यान भी केंद्रित होना आरंभ कर देता है।
 5- काम में मन लगने से ही काम में बच्चा विकसित होने लगता है। 
6- विकसित होने से उसके उत्साह में वृद्धि होती है और जिससे प्रत्येक व्यक्ति उसकी प्रशंसा करता है।
7- बच्चा अपने विचारों को व्यक्त करना सीखता है। 8- इस प्रकार उसका मौखिक कौशल बढ़ता है।
9- कभी-कभी अपने प्रशिक्षण प्रक्रिया के दौरान बच्चा दूसरों के संपर्क में आता है तो कुछ नई खोज के लिए प्रेरित हो अपने में उनकी खूबियों को समेट लेता है।
10- उसकी इस प्रतिक्रिया में से उसे रचनात्मकता का विकास अनायास ही हो जाता है।
11- जब बच्चे में प्रशिक्षण के समय अनजाने में यह सब खूबियां आ रही होती है, तब वह प्रस्तुतीकरण (presentation) भी करने लगता है। यह बात अलग है कि इसके कारण बच्चे कभी-कभी नखरीले भी हो जाते हैं।

 (B) शारीरिक विकास (Physical Development)-


1- उम्र के प्रथम 3 वर्षों में बच्चों की लंबाई सबसे तेजी से बढती है जिससे वह अपने को उठता हुआ महसूस करते हुए स्वयं से चढ़ने की कोशिश करने लगता है।
2- लंबाई के साथ ही उसका वजन भी बढ़ने लगता है और माता-पिता बच्चे को अधिक देर तक गोद में नहीं रख पाते। तो बच्चे को अन्य शैतानियां करने का अवसर भी मिल जाता है।
3- बोलने के कौशल का भी विकास इसी उम्र में होता है। यदि आप कोशिश करें तो आपका बच्चा एक साथ कई भाषाएं भी सीख सकता है- जैसे एक पंजाबी परिवार में जन्मा बच्चा पंजाबी घर में, इंग्लिश व हिंदी स्कूल में सीख सकता है। परंतु बड़े ऐसा करने में शर्म महसूस करते हैं। इसलिए कोशिश यही करें कि बच्चे के बोलने की कला का प्रशिक्षण कम उम्र में ही आरंभ करें।
4- 1 से 3 वर्ष के ही उम्र में ही उसका शारीरिक व मानसिक  विकास दोनों ही तेज़ी से होता है।



अन्य बिंदु (Others):-


(1) सकल कौशल (विभिन्न क्रियाएं)(Gross Skills)-


 विभिन्न प्रकार की क्रियाएं जैसे- लाइन में चलना, रस्सी कूदना, दौड़ना, पीछे मुड़के चलना, पेडलिंग करना, गेम खेलना, कूदना आदि द्वारा अनायास ही आपके थोड़े से प्रशिक्षण से बच्चा सीख जाता है। क्योंकि उससे इस पड़ाव में सीखने की प्रक्रिया तेज होती है।

 (2) विशिष्ट कौशल (Fine Skills)-


यदि आप अपने बच्चों को किसी विशेष क्षेत्र(field) में प्रशिक्षण देना चाहते हैं तो आपका थोड़ा सा प्रयास और 1 से 3 वर्ष में दिया गया प्रशिक्षण आपके बच्चे के लिए नींव की ईंट बन जाता है। जिस तरह इस उम्र में आपका बच्चा अपने आप हाथ धोना, ब्रश करना, नहाना आदि सीखने लगता है। वैसे उसकी रोज की आदत किताब पढ़ने, मानसिक गणित अभ्यास(mental maths) या फिर कुछ और रचनात्मक या कलात्मक क्रियाएं भी आरंभ की जा सकती है।

इस समय ही यदि आप अपने बच्चों की प्रकृति से प्राप्त रुचि और खूबियों को पहचान कर उसे उसी दिशा में और मोड़ दे तो अवश्य ही आपका बच्चा उस दिशा में अच्छा कर सकता है। क्योंकि एक तो उम्र की पहली सीढ़ी, दूसरा उसकी पसंद के काम और तीसरा आपका प्रशिक्षण- यह तीनों उसकी प्रगति में चार चांद लगा सकते हैं।

अब देर किस बात की! क्या सोच रहे हैं? पहचाने बच्चे का हुनर को पहचाने जिससे की उसका विशिष्ट प्रशिक्षण हो सके। 

(3) भावनात्मक विकास (Emotional Development):-


अक्सर आपने देखा होगा कि इतने छोटे बच्चो की प्रतिक्रियाएं बहुत जल्दी-जल्दी होती हैं। मना करने पर रोना, अच्छा लगने पर खिलखिलाना, कुछ खराब लगने पर मुंह बनाना, आपके गुस्सा दिखाने पर डरना आदि उसके भावनात्मक पहलू को दिखाता है।

बच्चा इस उम्र में अपने भावों को आप से व्यक्त करना और अपने भावों और भावना समझना सीखने लगता है। आपने शायद यह अनुभव किया हो कि यदि आप बच्चे के सामने रोते हैं तो वह भी रोने लगता है इसलिए नहीं कि वह आपके दुख का कारण जानता है बल्कि इसलिए क्योंकि उसकी भावनाएं आप से जुड़ी हैं।

इसीलिए यदि उस उम्र में बच्चा अपने काम स्वयं करता है तो वह आपका प्रोत्साहन चाहता है। प्रोत्साहन से बच्चा अपने काम की सफलता और असफलता का पता लगा लेता है। छोटे बच्चे आसानी से इस बात को समझ लेते हैं कि जो भी उन्होंने कार्य किया है वह सही है या गलत।

गलती हो जाने पर बच्चा उस काम को सही करने में संघर्षरत हो जाता है और उसे सही करके ही दम लेता है ताकि आपका भरपूर प्रोत्साहन पा सके ।तो आप यह कोशिश जरूर करें कि इस उम्र में आप बच्चे के साथ हर समय भावनात्मक और संवेदनात्मक रूप से जुड़े ताकि उसके व्यक्तित्व को आकार मिल सके।

परंतु ध्यान रहे अत्यधिक जुड़ाव उसकी स्कूली शिक्षा में रुकावट डाल सकता है और हो सकता है कि बच्चे स्कूल जाने में रोए पर यह एक सामान्य क्रिया है।

(4) सामाजिक विकास (Social Development):-



 इस उम्र में ही आपका बच्चा अपने साथ के बच्चों और बड़ों से दोस्ती की तरफ कदम बढ़ाता है। जिससे उसका सामाजिक परिवेश में प्रवेश हो जाता है और वह अपनी बातों, खिलौनों, खाने पीने की वस्तुओं आदि को बांटना सीख जाता है जिससे कि उसका सामाजिक दायरा बढ़ जाता है। साथ ही उसके आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है। इसलिए आप अपने बच्चे को 1 से 3 वर्ष की छोटी सी उम्र में समाज में रहने की आदत का विकास करे जो उसके जीवन में सामाजिक प्राणी बनने की नींव रखने में सहायक है।


 अंत में अपने शब्दों को समाहित करते हुए यही कहना चाहूंगी कि बच्चे के गर्भ में आने की जानकारी मिलने के प्रथम दिन से उसकी उम्र के 5 वर्ष तक की संपूर्ण शिक्षा व प्रशिक्षण उनके भविष्य निर्माण का कार्य करता है। इसलिए प्रत्येक माता-पिता को बच्चे के अच्छे भविष्य का निर्माता बनना चाहिए।

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