एक मां और किशोर बेटे के बीच स्वस्थ संबंध - Healthy relationship between mother and her adolescent son

एक मां और किशोर बेटे के बीच स्वस्थ संबंध


एक मां अपने बेटे को जन्म देकर उसकी पहली दुनिया बन जाती है और हर तरीके से अपनी पूरी शक्ति लगाकर वह अपने बच्चे के लालन-पालन में जुट जाती है। जन्म के बाद से ही एक मां अपने पुत्र पर अपनी ममता की अमृत वर्षा शुरू कर देती है जबकि बच्चा अनजाने में ही मां की सुख, सुविधा, आराम आदि सभी क्रियाओं को अनियमित और बाधित करता है। परंतु मां को यह सारी बाधाएं मनोहारी लगती हैं।
मां बेटे का यह पवित्र रिश्ता पूरी उम्र एक बेहद मजबूत सुरक्षित व विश्वास से भरी डोर से बंधा रहता है। 

सच कहें, तो बेटा मां की जान होता है और मां ही बेटे की पहचान। क्योंकि मां बच्चे की पहली शिक्षक (teacher), अभिभावक (parent) और संरक्षक (guardian) होती है। 
इसलिए प्राचीन काल में बेटों को उनकी माताओं के नाम से ही पुकारा जाता था। जैसे- कौशल्या नंदन राम, देवकीनंदन कृष्ण, गौरी पुत्र गणेश आदि। मध्यकालीन भारत में आक्रमणकारियों चलते माताओं का नाम लिखना बंद हो गया था। परंतु अब पुनः प्रत्येक बच्चे के हर आवश्यक प्रमाण पत्र पर उसकी माता का नाम भी अंकित किया जाता है। जो बच्चे की पहचान को एक विशेष दर्जा दिलवाया है।

 मां बेटे के स्वस्थ संबंधों की आधारशिला-


(1) संवेदनात्मकता (Sensitivity) :- 


पुत्र के जन्म के पूर्व ही मां अपने होने वाले बच्चे के साथ जुड़ जाती है और अपने बच्चे को स्वयं में महसूस कर सकती है व उसको अनुभव भी कर सकती है। घर में स्थित बच्चा भी मां की भावनाओं को महसूस करता है। यदि मां दुखी होती है तो गर्भ में भी बच्चा भी उतनी देर अपनी गर्भस्थ क्रियाओं में शिथिल (धीमा) रहता है और मां के खुश होने पर बहुत तेज प्रतिक्रिया देता है। इन संवेदनाओं का दायरा दिन पतिदिन बढ़ता ही जाता है और मां बेटे का चेहरा देख कर ही समझ जाती है कि उससे क्या चाहिए और बेटा मां की हर बात उनके उसकी आंखों व उसके कार्यों को देखकर समझ लेता है। दोनों की संवेदनाएं एक रूप रहती हैं।

(2) बुद्धिमत्ता (intelligence) :- 


बेटे के अंदर मां के दुख और खुशियां ही नहीं बल्कि उसे उसकी बुद्धि की तीव्रता और लचीलापन भी आ जाता है और वह अपनी माता की तरह सोचने समझने लगता है।

(3) मजबूती (strength) :- 


बेटे के अंदर सहनशक्ति और वैचारिक मजबूती उसकी माता से ही आती है। अपने मां को काम करते देख बच्चा भी काम करना सीख जाता है और अपनी मां को खुश करने की हर संभव कोशिश करने लगता है।

(4) व्यावहारिक समस्याएं (practical problems) :-


व्यवहारिक समस्या का लक्ष्य मानव क्रिया का वर्णन, भविष्य का कथन और सभी कार्यों का नियंत्रण है। जिससे कि हम हर बात को बुद्धिमत्ता पूर्वक समझ सकें और अपने को निर्देशित कर सकें। यह सब एक मां अपने व्यवहार से बेटे को अनायास ही सिखा देती है। गर्म, ठंडा, कड़वा, मीठा, भारी आदि अनेक चीजों को बच्चा केवल अनुभव करके ही सीख जाता है और समय व आवश्यकता अनुसार उसी प्रकार व्यवहार भी करता है। 

(5) सुरक्षा एवं आत्मविश्वास (security and self confidence) :- 


मां की मजबूत सुरक्षा से ही बेटा अपने को मजबूत बना पाता है और उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता जाता है।

(6) रचनात्मकता (creativity) :-

 
रचनात्मकता की कला बेटे में मां से ही आती है। यदि मां रचनात्मक होती है तो बेटा भी शत-प्रतिशत रचनात्मक होता है और वह अपनी मां से इस गुण को सीख लेता है। मां का  बोलना चालना, खाना-पीना, नृत्य, संगीत, चीजों के रखरखाव कला आदि अपनी मां की नकल करके सीखते हैं।

सच में देखा जाए तो बेटे का संपूर्ण व्यक्तित्व विकास (total personality development) एक मां द्वारा उसके बचपन में ही हो जाता है और बाद में उसमें सभी विशेषताएं जुड़ती चली जाती हैं। कुछ समय बाद उस पर आसपास के लोगों, शिक्षकों और दोस्तों का प्रभाव पड़ने लगता है, परंतु बच्चा अपना आधार पकड़ कर रखता है। 
फिर भी जैसे जैसे वह बड़ा होता है और किशोरावस्था की ओर बढ़ता है, उसके अंदर कई प्रकार के शारीरिक व मानसिक परिवर्तन आने शुरू हो जाते हैं और उसकी सामाजिक, आर्थिक, मानसिक व शारीरिक प्राथमिकताएं बदल सकती हैं और वह अपनी मां से कुछ अलग व्यवहार करने लगता है।

किशोरावस्था में कदम रखते ही बेटे के अंदर कई मानसिक बदलाव आते हैं और वह स्वयं को अपनी माता के सम्मान का रक्षक समझने लगता है। बस यही हो ऐसा समय है जहां मां और बेटे दोनों को कुछ बातों को ध्यान में रखना चाहिए।

 मां और बेटे के संबंधों को अच्छा बनाए रखने में आवश्यक उपाय:-


1- संबंधों को अच्छा बनाने में पहले पहल मां को करनी चाहिए क्योंकि वही अपने बेटे की पहली शिक्षक होती है।
 
2-  मां को अपने बच्चों को किशोरावस्था के दौरान में हो रही नहीं चीजों के बारे में खुलकर समझाना चाहिए।

3- मां को अपने बेटे के किशोर होने पर उसके साथ एक दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए ताकि बेटा अपनी सारी बातें मां से शेयर करें और वह किसी प्रकार का संकोच न करें।

4- समय-समय पर उसकी गलतियों को प्यार से उसे समझाएं और दोबारा ऐसी गलती न करने को कहें।

5- मां और बेटे दोनों को ही आपस में कभी भी किसी प्रकार की बहस नहीं करनी चाहिए।

6- दोनों मां और बेटे को एक दूसरे की प्रशंसा भी करनी चाहिए। चाहे तारीफ किसी क्षेत्र से संबंधित हो।

7- सबसे महत्वपूर्ण, दोनों ही एक दूसरे को अक्सर छोटी-छोटी उपलब्धियों या त्योहारों पर पुरस्कार दें तो दोनों को ही अच्छा लगेगा और इससे उनके बीच निकटता भी बढ़ेगी।

8- अगर एक मां होने के नाते आप उपहार दे रहीं हैं तो अपने बेटे से कुछ भी वापस आने की इच्छा न रखें। और यदि आप बेटा आपको कोई उपहार दें तो उसे सब को दिखाएं और अपने बेटे की प्रशंसा करें।

9- अपने बेटे की पूरी बात सुने और समझे क्योंकि इस उम्र में आपकी थोड़ी सी भी अनदेखी बेटे को गलत दिशा में भटका सकती है।

10- उसकी किसी भी गलती पर तुरंत प्रतिक्रिया न दें।

11- कोशिश करें कि रात का खाना आपका बेटा सदैव आपके साथ ही खाएं इसे आपको कई बातों में लाभ मिलेगा-

(अ) एक तो रात में देर तक बाहर रहकर बुरी संगत में नहीं पड़ेगा।
(ब) दूसरा समय से घर आकर नियमबद्घ तरीके से खाना पीना खाकर समय पर सोने से बच्चे स्वस्थ भी रहेंगे।

12- उसके दोस्तों के बारे में पूछे। उनसे मिलें।

 उन्हें अपने घर बुलाए, उन्हें सम्मान दें, उनके साथ भी थोड़ा समय बिताएं और बातचीत करें।

13- यदि आपके बेटे के दोस्तों में कोई लड़की है तो उससे जरूर घर में बुलाएं और उससे बातचीत करें। साथ ही अपने बेटे को सामाजिक सीमाओं से भी अवगत कराएं।

14- इस उम्र में बेटा अपना भविष्य निर्माण सुनिश्चित करता है। उसे उसके पसंद के भविष्य के लिए प्रेरित कर उसमें सहयोग दें।

15- उसकी कमियों को नजरअंदाज न करते हुए उसे उन कमियों को ठीक करने के उपाय बताएं। साथ ही कुछ जटिल समस्याएं भी उसे सुलझाने के लिए दें।

16- हर मां को अपने किशोर बेटों से घर के काम जैसे- डस्टिंग, चाय बनाना, कपड़े सुखाना, बिस्तर ठीक करना, घर की सफाई आदि कामों में मदद लेनी चाहिए जिससे कि उन्हें मां द्वारा किए जा रहे कार्यों में उनकी मेहनत का अंदाजा रहे।



यह बात ध्यान रहे कि आप किशोरावस्था से ही बेटे को मां और पत्नी के रोल को बताना शुरू करें ताकि वह आने वाले समय में आप का सम्मान और देखरेख के साथ ही अपनी पत्नी के मान और उसकी जरूरतों को भी उचित महत्व दे कर दोनों के बीच समन्वय रख सके। मां की किशोरावस्था की शिक्षा बेटे की भविष्य का निर्धारण करती है और मां की बुढ़ापे को सुखमय बनाती है।

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