बच्चों में आत्मसम्मान की भावना बढ़ाने के तरीके - Ways to build more self esteem in your child

बच्चों में आत्मसम्मान की भावना बढ़ाने के तरीके :-


सबसे पहले हमें यह समझना है कि आत्म सम्मान क्या होता है? और किस उम्र से बच्चों में यह उत्पन्न हो जाता है?
तो आप ऐसा समझ सकते हैं कि आत्मसम्मान आत्मनिर्भर बनने का पहला कदम है। एक बच्चा तीन महीने की छोटी उम्र में ही आपके व्यवहार (यानी आपके हंसने, डाटने, उसके साथ खेलने, उसके पास से उठकर जाने, उसको गोद में उठाने आदि) पर अपने चेहरे के मनोभावों द्वारा आप को आकर्षित करते हैं। और यदि आप उसको अनदेखा (overlook) करते हैं तो वह रोने लगता है। 

क्या आप जानते हैं कि वह ऐसा क्यों करता है? क्योंकि उसके आत्मसम्मान को क्षति पहुंचती है। अब आप सोच रहे होंगे कि इतना छोटा सा बच्चा और आत्म सम्मान! हां, यह सच है क्योंकि उसके आत्मसम्मान का पहला कदम मां की गोद से ही शुरू होता है। वह जो भी करता है, वह चाहता है कि उसकी मां उसे देखें, उसकी सराहना करे, उसकी हर हरकत को सम्मान दें। ऐसा न होने पर वह रो-रोकर अपने को अभिव्यक्त करता है और तब मां को उसे गोद में लेकर उसके सम्मान की रक्षा करनी पड़ती है। और यदि ऐसे में घर का कोई अन्य व्यक्ति उसे ले लेता है तो वह बच्चा जिद में रो-रोकर तूफान मचा देता है। बस यहीं से शुरू होती है उसके आत्मनिर्भर बन अपने आत्मसम्मान को बचाने और बढ़ाने की प्रक्रिया।

आत्मसम्मान के प्रकार (Types of Self-Respect):-


 विषय को आगे बढ़ाने से पूर्व आपको यह समझना जरूरी है कि आत्म सम्मान कितने प्रकार का होता है-
(1) सकारात्मक (Positive)
(2) नकारात्मक (Negative)

(1) सकारात्मक आत्म सम्मान :-


यह आत्मसम्मान सुरक्षात्मक भावना से भरा होता है और बच्चा अपने कार्य को स्वयं करने में गर्व का अनुभव करता है। उसके अंदर उत्साह और आत्मविश्वास का विकास होता है। यह दो प्रकार का होता है -

(अ) मानसिक -


सकारात्मक मानसिक आत्मसम्मान बच्चों के अंदर सहानुभूति, दया, धर्म, अच्छा व्यवहार, कृतज्ञता, प्यार, दूसरों के प्रति आदर, उदारता, सामाजिक संतुलन, सही शब्दों का प्रयोग व व्यवहार द्वारा नाराजगी दिखाना, समर्थन करना या आलोचना आदि गुणों को उत्पन्न करता है। 

(ब) शारीरिक -


सकारात्मक शारीरिक आत्मसम्मान से सबसे पहले बच्चा 'खुद कैसे दिखे?' पर ध्यान देता है और फिर उसके आसपास जो लोग हैं वे कैसे दिखते हैं पर ध्यान देता है। बच्चे को अपने माता पिता को बेढ़ंगे कपड़े पहने देखना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता और बच्चे  अपने माता-पिता को उनके पहनावे के लिए टोकना आरंभ कर देते हैं। इसलिए आपको बचपन से ही बच्चे को उसके good look यानी अच्छा दिखने पर जोर देना चाहिए। साथ ही यही वह उम्र है जब वह अपने परिवार का विस्तार करना शुरू करता है। छह महीने की छोटी उम्र से वह अपनापन समझने लगता है तभी तो वह जिसको प्यार करता है उसकी गोद में चला जाता है। उसके गले में लिपट जाता है। एक साथ खेलना और साथ में खाना पीना, परिवार का हिस्सा बनकर घर के कामों में मदद करना चाहे वह कार्य ठीक प्रकार से ना कर पाए पर अपनी समझ में वह घर का बहुत काम करते हैं।

कुछ अच्छा बनने पर या अच्छे से तैयार होने पर खुद की और अपनी तारीफ करना आदि यह सभी क्रियाएं आपके बच्चे के सकारात्मक शारीरिक आत्मसम्मान की ओर इशारा करती हैं। सकारात्मक आत्मसम्मानीय बच्चे सुरक्षात्मकता के कवच में रहते हैं।

(2) नकारात्मक आत्मसम्मान :-


इस प्रकार के आत्मसम्मान को आत्म सम्मान कहना गलत है क्योंकि यह एक जबरदस्ती दबाव अथवा डर पैदा करके दूसरों से छीना जाता है। लोग मन से ऐसे व्यक्ति को सम्मान नहीं देते हैं। जो व्यक्ति सिर्फ और सिर्फ अपनी बातों को मनवाना जानता है। इस प्रकार की नकारात्मक सोच बचपन में मिली अवहेलना से बच्चे में पैदा होती है और हर वह बच्चा जिससे बचपन से ही या तो दबा कर रखा गया है या उसके साथ अत्यधिक मारपीट की गई हो, ऐसी प्रकृति का हो जाता है। 

इसके भी दो प्रकार होते हैं -

 (अ) मानसिक -


 ऐसे नकारात्मक मानसिक आत्मसम्मानीय बच्चे बचपन से ही अवसाद (दुखी) ग्रस्त और चिंतित रहते हैं। वे अपने ऊपर परिवार का दोस्तों को समाज का दबाव महसूस करते रहते हैं। उनके अंदर असुरक्षा की भावना घर कर जाती है और वह अपने को बचाने के लिए शुरू में झूठ बोलना फिर चोरी करना, मारपीट करना, धोखा देना आदि गुणों को अपने अंदर विकसित कर लेते हैं। समाज के साथ-साथ बड़े होने पर वह बदमाश और शरारती बनकर समाज को कलंकित करते हैं। 

(ब) शारीरिक :-


 नकारात्मक शारीरिक सोच के माहौल में पलने वाले बच्चे असुरक्षित महसूस करते हैं इसलिए यदि आप देखे तो उसे घर आए मेहमान के सामने ही जिद करना शुरू कर देते हैं। वे जानते हैं कि बाहर के व्यक्ति के सामने उनकी मांग पूरी कर दी जाएगी बस यहीं से उनके अंदर जिद करना, हक जमाना, जबरदस्ती करना, कोई बात मना करने पर बहस करना, अपने छोटे बड़े भाई बहनों से लड़ाई करना, उनकी चीजें छीन लेना या फेंक देना, तोड़फोड़ मचा देना आदि करने लगते हैं। ऐसे बच्चे अहंकारी और संकीर्ण मानसिकता (narrow minded) वाले बन जाते हैं और समाज को सीमित दायरे में रखकर उस पर अपने अपनी हुकूमत चलाना चाहते हैं।

वे विस्तार वादी कभी भी नहीं बन पाते और दूसरों को सताने और परेशान करने वाले बन जाते हैं। आपको बता दें बचपन में बच्चे के अंदर की असुरक्षा की भावना ही नकारात्मकता को जन्म देती है। आप बच्चे के अंदर किसी भी कीमत पर इस भावना का विकास न होने दें।

आपको लग रहा होगा कि मैं मूल विषय आत्म सम्मान से भटक गई हूं लेकिन ऐसा नहीं है। अभी तक मैंने आपको आत्म सम्मान के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों को समझाया है क्योंकि बिना इन पहलुओं को समझे आप अपने बच्चों में किस प्रकार से आत्मसम्मान को विकसित करें यह नहीं समझ पाते।



 सकारात्मक आत्म सम्मान के लिए आवश्यक बातें-


1- सबसे पहले आपको खुद का आकलन करना होगा और अपने व्यवहार को बच्चों के हिसाब से सरल बनाना होगा।

2- बच्चे को सुरक्षित अनुभव कराते हुए उसकी गलती पर बिना डांटे उसकी गलती को सुधारना होगा।

3- बच्चे के जिद करने पर उसकी जिद तुरंत पूरी नहीं करनी चाहिए।

4- उसके द्वारा किए गए छोटे छोटे कार्यों की सराहना कीजिए ताकि उसका आत्मविश्वास बढ़े।

5- बच्चे के पहनावे पर विशेष ध्यान दें। उसे सही ढंग से कपड़े पहनाए ताकि वह हर समय अच्छा दिखे। इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा।

6- आप स्वयं भी अपने कपड़ों और घर के रखरखाव पर ध्यान दें।

7- खान पान पर विशेष तौर पर ध्यान दें क्योंकि शुद्ध, ताजा और घर का बना खाना बच्चे का अच्छा पोषण करता है। बाजार का बना खाना, जंक फूड में अनेकों मिलावट होती हैं जो बच्चों को आए दिन बीमार कर सकती है। बार-बार बीमार पड़ने से बच्चों के आत्मविश्वास में कमी आती है और शारीरिक कमजोरी के साथ-साथ मानसिक तौर पर भी वह अशक्त होने लगते हैं।

8 - आपका बच्चा यदि कभी किसी काम को एक बार में न कर पाए तो उसे वही कार्य दोबारा करने के लिए प्रेरित करें।

9- उसकी सीधे-सीधे निंदा कभी भी न करें। 

10- सराहना करें। बच्चे के हर कार्य की सराहना करें क्योंकि सराहना एक ऐसा रामबाण है जो ब्रज अस्त्र (इंद्र के अस्त्र) को भी भेदने में सक्षम है।

बच्चे की छोटी छोटी बातें बातों जैसे पेंसिल पकड़ने, पेज पलटने, अपने हाथ से खाना खाने आदि सभी क्रियाओं की सराहना करें। इससे उसके आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और उसका आत्मविश्वास सम्मान और स्वयं से काम करने की भावना का विकास होता है।

अपने आलेख की पूर्णता से पहले मैं यह स्पष्ट करना जरूरी समझती हूं कि आप जाने की आत्म - सम्मान का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि पूरी दुनिया आप के चारों ओर घूमें और सिर्फ आपको ही महत्व दे और न ही इसका यह अर्थ है कि आप और आपका बच्चा ही सबसे महत्वपूर्ण है, शेष कोई भी नहीं। अब यह आपकी जिम्मेदारी है कि आपके बच्चे में बचपन से ही सकारात्मक आत्म सम्मान व आत्मविश्वास पैदा हो सके।

अति उत्साह, अति आत्मविश्वास, अति का दिखावा या आपका अपने बच्चे पर अति गर्व करना कहीं आपके बच्चे को भटका न दे। इसलिए हमारे बुजुर्ग कहते आए हैं, "अति सर्वत्र वर्जयते " अर्थात जरूरत से ज्यादा कुछ भी अहंकार और घमंड को जन्म देता है और तो अब अभिभावक होने के नाते आप पर अपने बच्चे को अच्छे भविष्य निर्माण की पूरी जिम्मेदारी आकर ठहरती है और उसके जीवन के आरंभ के साथ ही अच्छे अभिभावक होने की परीक्षा शुरू हो जाती है। आपका धैर्य, सकारात्मक और सबल सहयोग आपके बच्चे को ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है और आप की नकारात्मक सोच उसे गिरा भी सकती है। 

तो सदैव आशावादी रहकर सकारात्मक सोच के साथ अपने आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए अपने बच्चे को स्वच्छ, स्वस्थ व शुभ परिणामी सकारात्मक सोच का विकास करने में भागीदार बनी है बनिए।


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