एक बच्चे की परवरिश के खर्च को कम कैसे करें? How to reduce the cost of raising a child?

एक बच्चे की परवरिश के खर्च को कम कैसे करें? 

How to reduce the cost of raising a child? 

हिंदी के अभिभावक शब्द को अंग्रेजी में Parent कहा जाता है। मेरे विचार से इस एक शब्द की रचना अनेक अर्थ पूर्ण (meaningful) शब्दों से मिलकर हुई है -

P- is for patience

A- is for attentive

R- is for responsible

E- is for encouraging

N- is for nurturing

T- is for takes care of me

S- is for special, parent




अर्थात् वह पति-पत्नी (husband - wife) जो अपने बच्चे के दुनिया में आने की सूचना से ही उसके साथ भावनात्मक और आत्मीय रूप से जुड़कर उसके सुनहरे भविष्य की योजना बनाने और उसके अनुसार ही अपने आने वाले बच्चे के लालन-पालन की तैयारी आरंभ कर देते हैं। आज का हर युवा अभिभावक अपने बच्चे पर  अधिक ध्यान देकर पूरी तैयारी से योजना बनाकर इस दुनिया में लाने का विश्वास करता रखता है। इसलिए उसकी योजनाओं में बच्चे के दुनिया में आने के पहले से लेकर उसके वयस्क (बड़े) होने तक उस पर होने वाले अनुमानित व्यय की पूरी आर्थिक तैयारी शामिल होती है।

यह अनुमानित व्यय कहां-कहां, किन किन चीजों पर, कैसे कैसे होता है? यदि पहले उसको समझ लें, तो ही हम अपने बच्चों पर होने वाले ख़र्चों को नियंत्रित या कम करने की बात को आसानी से समझ पाएंगे।

अनुमानित व्यय :-

(1) बच्चे के दुनिया में आने के लक्षण दिखते ही टेस्ट करवाने का खर्चा पूरे समय तक लगभग 10,000 
 
(2) मां में हो रहे शारीरिक और हार्मोन परिवर्तन को संतुलित रखने के लिए उसके खानपान और दवाइयों आदि पर आए व्यय।

(3) जैसे - जैसे बच्चे के जन्म का समय पास आता जाता है, वैसे - वैसे अस्पताल में डॉक्टर के व्यय।

(4) यदि बच्चा साधारण (normal) जन्म लेता है तो थोड़ा कम खर्च होता है परंतु तब भी 10,000 ₹ से 25,000 ₹ तक प्राइवेट अस्पताल में लग जाता है। अगर सी सेक्शन (ऑपरेशन) से होता है तो 53,000 ₹ से 70,000  का खर्चा आता है।

(5) आजकल चिकित्सा जगत में रोगों से लड़ने के नए-नए तरीके आ रहे हैं, उन्हीं में से एक है नाड़ी संरक्षण (cord preservation) जिसमें बच्चे के जन्म लेते ही उसकी नाड़ी का कुछ भाग संरक्षित रखा जाता है। जो भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर बच्चे या उसके अन्य सगे भाई या बहन के लिए अनेक जानलेवा बीमारियों से बचाने का काम आता है। यह खर्चा लगभग 55,000  से 70,000 ₹ के बीच का होता है।

(6) बच्चे के कपड़े, क्रिब्स, डायपर आदि पर व्यय।

(7) तेल, साबुन, पाउडर, दवाई आदि पर व्यय।

(8) टीकाकरण पर व्यय।

यह व्यय तो बच्चे के आने की सूचना से उसके जन्म लेने तक के हैं। परंतु जो खुशियां, आनंद, उल्लास घर के आंगन में आने वाली है उसके आगे यह सभी खर्चे कम दिखाई पड़ते हैं और हर माता-पिता इनको खुशी-खुशी करता है।

 अन्य खर्चे :-

 आइए जानते हैं अन्य खर्चों के बारे में -

शुरू में बच्चे के खानपान पर प्रतिमाह लगभग 2,000  से 5000  तक का खर्च।

बड़े आवास की जरूरत यानी यदि 1BHK में रहते हैं तो 2BHK के मकान की आवश्यकता क्योंकि यदि बच्चे को अच्छी तरह से परवरिश देनी है तो मकान का खर्च भी बढ़ेगा।

बच्चे के भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, किताबे, खिलौनों आदि पर लगातार खर्च बढ़़ता ही जाता है।

* बढ़ते बच्चे के साथ-साथ स्कूल की फीस, बोर्ड की फीस, ट्यूशन की फीस, कॉपी किताबों का खर्चा, सहायक लेखन सामग्री आदि मिलाकर न्यूनतम एक से डेढ़ लाख तक प्रतिवर्ष का खर्च।

* कोविड-19 की महामारी ने मोबाइल और रिचार्ज का खर्च भी बढ़ा दिया है।

* बच्चों के मनोरंजन, घूमने फिरने, फैशन आदि पर खर्च।

*  व्यावसायिक प्रशिक्षण (professional training) पर आज सबसे अधिक होता है। इस पर होने वाले खर्चे की शरुआत 5 लाख  से लेकर 2 करोड़ ₹ तक हो जाती है। जो एक सामान्य निम्न वर्ग के माता-पिता की सोच से भी परे है।

अगर संक्षेप में देखें तो हम देखेंगे की कुल आय का 46% शिक्षा पर, 12% मनोरंजन पर, 25% खाने पीने पर व्यय हो जाता है। बचा 17% बीमारी, दवा, इलाज, बचत सब पर खर्च होता है।

हमारा विषय है कि क्या हम इन खर्चों को कुछ हद तक कम कर सकते हैं? तो मेरा उत्तर है, हां! हम कर सकते हैं। आइए जानते हैं,

 

खर्चे नियंत्रित करने के उपाय :-

ICDS (INDIAN CHILD DEVELOPMENT STUDY) के सुझावों और अनुरोधों के अनुसार कुछ ऐसे उपाय हैं जो कुछ हद तक बच्चों पर हो रहे व्यय को हर स्तर पर कम कर सकने में सहायक हो सकते हैं -


(1) बच्चे का प्रसव ग्रामीण क्षेत्र या स्वास्थ्य केंद्रों पर और शहरों में सरकारी और अर्ध सरकारी अस्पतालों में कराने पर जन्म के समय हो रहे अतिरिक्त व्यय को एक चौथाई किया जा सकता है और वह बचत भविष्य में बच्चों के काम आ सकती है।

(2) फॉर्मूला मिल्क और पौष्टिक आहार ग्रामीण क्षेत्र के दवाई की दुकानों से उचित मूल्य पर मिल जाती है।

(3) माँ की अच्छी खिलाई पिलाई से फॉर्मूला मिल्क की आवश्यकता नहीं होगी।

(4) 6 महीने का होने पर दाल और चावल के पानी द्वारा भी फॉर्मूला मिल्क के कंपोनेंट बच्चे को दिए जा सकते हैं।

(5) कुछ चीजें जैसे कपड़े, खिलौने, पालना आदि अपने परिवार या दोस्तों से शेयरिंग करके प्राप्त किए जा सकते हैं तो इन पर होने वाले व्यय को कम किया जा सकता है।

(6) बच्चे की बुनियादी शिक्षा को इतना मजबूत कर दें कि आरंभ से ही बच्चों में छात्रवृत्ति लेने की आदत सी हो जाए। तो आप पर आने वाले फीस के बोझ को कुछ कम किया जा सकता है।

(7) ट्यूशन पढ़ाने की जगह बच्चों और उसके दोस्तों को एक साथ शाम को घर पर बैठकर पढ़ने की आदत डलवाने से ट्यूशन फीस पर व्यय कम होगा।

(8) बच्चे को अपने सीनियर से जान पहचान बनाने को कहें ताकि उसे अपने सीनियर की किताबें और नोट्स आसानी से मिल जाए। तो इससे किताबों के खर्च को कम किया जा सकता है।

(9) लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ने और वहां से किताबें लाकर पढ़ने की आदत डालें। तो पढ़ाई के साथ बच्चा अपनी वस्तुओं की सुरक्षा तथा बचत भी सीखेगा।

(10) कोविड-19 ने सब को तकनीकी प्रबलता दे ही दी है तो बच्चे को यूट्यूब से भी मदद मिल सकती है।

(11) प्राविधिक या व्यावसायिक (technical or professional) शिक्षा के लिए बच्चे को फ्री सीट पर अपना सिलेक्शन कराने की तरफ प्रेरित करें ताकि आप पर आने वाले एक बहुत बड़े आर्थिक बोझ को काफी हद तक कम किया जा सके।

(12) शुरुआत से ही कोशिश करें कि आपका बच्चा किसी अच्छे सरकारी स्कूल में पढ़ने जाए। वहां फीस बहुत ही कम होती है।

  2011 में Economics Times में प्रकाशित एक आंकड़े में लिखा गया था कि 21 वर्ष का होने तक सामान्य मध्यवर्गीय परिवार अपने बच्चों पर लगभग 54 से 75 लाख रुपए तक खर्च कर रहा था जो 2019 तक लगभग 6% प्रतिवर्ष के हिसाब से बढ़ रहा है। इसी में माता-पिता की एक बच्चा रखने की मनोदशा का कारण भी अत्यधिक बढ़ते खर्चों को माना गया है। आप अपनी सूझबूझ, दूरदर्शिता और बचत द्वारा अपने बच्चे में सहयोग लेकर आगे बढ़ने और अपने बल पर अपने को खड़ा कर पाने के दृढ़ निश्चय द्वारा बच्चे के अच्छे भविष्य का निर्माण कम खर्चे में करके एक सफल, सुखी, शांतिपूर्ण, चिंता मुक्त और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।

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