छोटे बच्चों से जुड़े मिथक और उनके वैज्ञानिक कारण


हमारे समाज में आज भी ज्यादातर लोग अंधविश्वास में जीते हैं। हर एक रिवाज में वह कहीं न कहीं से अंधविश्वास को ढूंढ ही लेते हैं। चाहे वह रात में नाखून काटने हो, घर के बाहर नींबू मिर्ची टांगना हो या फिर बिल्ली का रास्ता काट जाना हर चीज में लोगों के मन में भ्रम बैठा हुआ है और अगर कोई कुछ कह भी देता है कि यह काम ऐसे न करो तो लोग मान भी लेते हैं। ठीक वैसे ही बच्चों के साथ भी होता है। जैसे जब से बच्चा जन्म लेता है तब से हर कोई अपनी सलाह देने लगता है कि बच्चे को यह लगाओ ऐसा होगा, बच्चे को शीशा नहीं दिखाना चाहिए, काजल लगा के रखना चाहिए, बच्चा रो रहा है तो रोने दो, कान साफ करना है तो तेल डालो और यह सब कहीं न कहीं लोग मान भी लेते हैं कि हमारे बच्चे की बात है और बड़े लोग गलत नहीं कह रहे होंगे और फिर उन लोगों की बातों के अनुसार चलने लगते है।

प्रत्येक चीज का एक वैज्ञानिक कारण होता है। पहले जमाने में जिन्होंने भी रिवाज बनाए थे तो उसके भी कारण होते थे। घरों में या दुकान के बाहर नींबू मिर्च टांगने का रिवाज बहुत ही पुराना है लेकिन जिन्होंने यह रिवाज बनाया था वह क्यों बनाया इसके पीछे का कारण जानने की कोशिश कोई नहीं करता। पहले के समय में लोग चीजों को ध्यान से देखते थे और उससे लोगों ने यह जाना कि नींबू और मिर्च में कीड़े नहीं लगते। पहले के समय में यह मच्छर मारने के लिए कॉइल या अगरबत्ती नहीं होते थे तो लोगों ने सोचा कि क्यों न इसे कीड़े- मकोड़ों को दूर रखने के लिए इस्तेमाल किया जाए। तब से लोग यह घर के बाहर टांगने लगे। ठीक वैसे ही हर रिवाज के पीछे अगर कोई तर्क या वैज्ञानिक कारण हो तभी उसे मानना चाहिए

 आज के इस लेख में हम बच्चों से जुड़े कुछ अंधविश्वास के पीछे क्या कारण हो सकते हैं, वह जानेंगे और उन्हें समझेंगे और उनके पीछे के तर्क भी जानेंगे। तो चलिए शुरू करते हैं हमारा आज का विषय-

 छोटे बच्चों से जुड़े मिथक और उनके वैज्ञानिक कारण -

(1) बच्चे की मालिश करने के बाद उसे धूप में लेटाना चाहिए

पहले के समय में हर चीज शुद्ध होती थी। उस समय की हवा और धूप में भी कोई भी प्रदूषण नहीं था तो बच्चे को तेल मालिश करके विटामिन डी देने के लिए धूप में सुला देते थे। तब इतनी तेज धूप की भी नहीं होती थी लेकिन आज के समय में हम सब जानते हैं कि एक तो सरसों का सरसों का शुद्ध तेल भी आसानी से नहीं मिलता और बाहर प्रदूषण और ग्लोबल वॉर्मिंग इतनी बढ़ गई है कि हमारी ओजोन परत नष्ट हो रही है इसलिए बच्चे पर UV किरणें सीधी पड़ती हैं और बच्चे की त्वचा बहुत नाजुक होती है तो उस पर बुरा प्रभाव पड़ता है और बच्चे बीमार हो जाते हैं।


(2) बच्चे को काजल लगाने से आंखें बड़ी होती है



पहले के समय में काजल भी शुद्ध होता था जिसको लगाने से बच्चों की आंखों में चमक आ जाती थी तो दो लोग इसे लगाते थे। लेकिन काजल में कार्बन होता है जो बच्चों की आंखों को नुकसान पहुंचाता है। इस विषय पर एक लेख में पहले लिख चुकी हूं जिसका लिंक नीचे दिया गया है आप उसे जरूर पढ़ें ताकि आपको कुछ मदद कर सकें मिल सके।


(3) नवजात शिशु को नए कपड़े नहीं पहनाने चाहिए


लोगों का कहना है कि बच्चा जन्म लेता है तो वह साफ नहीं होता क्योंकि वह खून से लिपटा हुआ होता है इसलिए उसे नया कपड़ा नहीं पहनाना चाहिए। जबकि इसके पीछे का कारण है कि बच्चे की त्वचा बहुत ही नाजुक होती है और नए कपड़े के रेशे से उसकी त्वचा पर रगड़ लग सकती है। पुराने कपड़े काफी बार धुल चुके होते हैं तो वह मुलायम हो जाते हैं तो आप नए कपड़ों को भी धो कर बच्चों को पहना सकते हैं उसे कोई दिक्कत नहीं होगी।


(4) छोटे बच्चे को कपड़े की नैपी पहननी चाहिए डायपर नहीं


नवजात शिशु हर थोड़ी देर में सूसू, पॉटी करते हैं और क्योंकि मां गर्भावस्था के 40 दिन इतनी कमजोर होती है कि उन्हें हर कुछ मिनट में बच्चे की नैपी बदलने में मुश्किल होती है और अगर थोड़ा भी ध्यान न दिया तो गीला रहने से बच्चे को ठंड लग सकती है। नवजात शिशु के लिए डायपर उनके हिसाब से ही बनते हैं तो आप उसे पहना सकते हैं। बस उसकी त्वचा की नमी बनाए रखें और हर 3 घंटे में उसका डायपर बदलते रहे ताकि बच्चे को infection न हो और साथ ही बच्चे की मां को भी आराम करने का समय मिल सके।


(5) बच्चे की नाक कान और कान में तेल डालने से वह साफ रहते हैं


आप जब सरसों का तेल बालों में लगाते हैं तो वह हटाने के लिए आपको शैंपू करना पड़ता है तो सोचिए वही तेल जब बच्चों के कान या नाक में जाएगा तो उसे साफ करना करने में मुश्किल हो सकती है और बच्चे के लिए समस्याएं बढ़ सकती हैं। डॉक्टर भी बच्चे के कान में और नाक में तेल डालने से मना करते हैं।


(6) बच्चे को पानी जरूर पिलाना चाहिए



काफी लोग कहते हैं कि बच्चे के होंठ और गला सूखता होगा तो उसे पानी पिलाना चाहिए लेकिन यह एक मिथक है। बच्चा केवल स्तनपान करता है जिससे उसे भरपूर मात्रा में पानी मिलता है। अगर आप बच्चे को फार्मूला मिल्क भी देते हैं तो वह भी पानी मिला कर देते हैं तो बच्चे में पानी की कमी नहीं होती। छोटे बच्चों का पेट जल्दी ही भर जाता है और अगर आप पानी अलग से देते हैं तो उसके एक समय का पोषण आप खत्म कर देते हैं। फिर कुछ देर उसका पेट भरा रहता है और वह स्तनपान नहीं करता जो कि गलत है।


(7) जब बच्चे के दांत निकलते हैं और उन्हें मसूड़ों में दर्द होता है तो उनके मसूड़ों में शहद लगाने से दर्द ठीक हो जाता है।


शहद में कुछ ऐसे बैक्टीरिया होते हैं जो बच्चों में मसूड़ों में इन्फेक्शन और कैविटी पैदा करते हैं। बाजार में जो शहद मिलता है वह शुद्ध नहीं होता और बच्चों के आने वाले दांतो के लिए बहुत ही हानिकारक होता है। इसलिए एक साल तक के बच्चों को शहद नहीं देना चाहिए।


(8) बच्चों को शीशा दिखाने से उसके दांत नहीं निकलते और उनको दस्त भी हो जाते हैं।

 यह केवल एक अंधविश्वास है क्योंकि इसके पीछे न कोई तर्क है और न ही कोई वैज्ञानिक कारण। पहले समय में लोग यह इसलिए मना करते थे क्योंकि शीशे से बच्चों को चोट लग सकती है और छोटे बच्चों को शीशे को देखकर काफी खुश होते हैं क्योंकि उनके सामने उन्हीं के जैसा छोटा बच्चा उन्हें दिखता है। अगर बाहर देशों की बात करें तो वहां बच्चे कई सारे शीशे से बने खेल खेलते हैं और उनके माता-पिता भी उनके साथ खेलते हैं और ऐसा करने से उन्हें कोई भी समस्या नहीं होती।


(9) Cow milk and formula milk is more nutritious than breast milk


अक्सर लोगों का कहना होता है कि गाय का दूध या फार्मूला वाले दूध में breast milk से ज्यादा पोषक तत्व होते हैं और उससे बच्चे ज्यादा स्वस्थ रहते हैं। लेकिन ब्रेस्ट मिल्क में जितने पोषक तत्व होते हैं उतने किसी और पदार्थ भी नहीं होते। शोध में भी यही पाया गया है कि ब्रेस्ट मिल्क पीने वाले बच्चे गाय का दूध और फॉर्मूला मिल्क पीने वाले बच्चों से ज्यादा मजबूत होते हैं।


(10) बच्चों को परछाई से खेलने से उनकी तबीयत खराब हो जाती है और वह बिस्तर गिला करते हैं।


इस मिथक के पीछे का कारण है कि बच्चे परछाई से खेलते हैं और रात में सोते समय बच्चे को वही सपने आते हैं जो कि वह दिन भर करते हैं इसलिए सपने में वही परछाई देखकर डर सकते हैं और बिस्तर गीला हो जाता है। लेकिन ऐसा हर बच्चे के साथ नहीं होता।


(11) प्राइवेट हॉस्पिटल से बच्चे का वैक्सीनेशन कराना सरकारी अस्पताल के मुकाबले ज्यादा सही होता है।


 लोग कहते हैं कि बच्चे का टीकाकरण प्राइवेट अस्पताल से कराना चाहिए क्योंकि सरकारी अस्पताल में लापरवाही ज्यादा होती है। लेकिन इसके पीछे का कारण है कि प्राइवेट अस्पताल में बच्चे की टीकाकरण में वह टीके भी दिए जाते हैं जिनकी सच में बच्चों को जरूरत नहीं है। हम भी यह सोचकर टीकाकरण कराते हैं कि बच्चे को कोई दिक्कत न हो। लेकिन अगर आप सरकारी अस्पताल में जाएंगे तो वहां के टीकाकरण चार्ट लगा होता है कि कौन से टीके बच्चों को लगवाने चाहिए और क्यों, तो उसी हिसाब से बच्चों का टीकाकरण कराएं।


 यह थे कुछ मिथक जो ज्यादातर लोग बोलते हैं और मानते हैं। लेकिन तार्किक रूप से अगर हम इनके पीछे का कारण समझे तो आपको नहीं लगता कि हम अपने बच्चों की सेहत के साथ कहीं न कहीं खिलवाड़ कर रहे हैं। आज के इस वैज्ञानिक युग में हमें अंधविश्वासों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। किसी भी रिवाज़ या मिथक के पीछे का कारण जाने बिना उसे नहीं मानना चाहिए। क्योंकि इससे हमारे बच्चों को परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। प्रत्येक स्थिति के पीछे का कारण विज्ञान में है इसलिए हर बात का वैज्ञानिक कारण जानना बहुत जरूरी है। हमारे पूर्वजों ने जो रिवाज बनाए हैं उनके पीछे कोई तर्क या कारण होते थे इसलिए किसी भी बात पर विश्वास करने से पहले उनके पीछे का कारण जरूर जान लें। पुराने रीति रिवाजों पर विश्वास कीजिए, अंधविश्वास नहीं। 

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